अत्रेय महाकाव्य: शून्य से सृजन और आजमगढ़ की पावन कर्मभूमि की अमर गाथा
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क्या आपने कभी उस ‘शून्य’ के बारे में सोचा है जहाँ से इस अनंत ब्रह्मांड का उदय हुआ? क्या आप जानते हैं कि आजमगढ़ की पवित्र नदियाँ—तमसा, मंजूषा और कुँवर—किन महान ऋषियों की साधना की साक्षी रही हैं?
मुझे यह बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि ‘अत्रेय महाकाव्य’ अब एक सुंदर डिजिटल प्रारूप में पूरी तरह से निःशुल्क उपलब्ध है। यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के त्याग, तप और उनके तीन दिव्य पुत्रों के महात्म्य की एक आधुनिक प्रस्तुति है।
इस महाकाव्य में आप क्या पढ़ेंगे?
- ब्रह्मांड की आदि गाथा: शून्य से शुरू हुआ वह नाद जिसने सृष्टि का आधार बनाया।
- आजमगढ़ - त्रिदेवों की कर्मभूमि: महर्षि दुर्वासा, भगवान दत्तात्रेय और चंद्रमा ऋषि के उन आश्रमों का वर्णन जो आज भी हमारी आस्था का केंद्र हैं।
- चित्रकूट का वह पावन मिलन: जब श्रीराम और माता सीता अत्रि-अनुसूया के आश्रम पहुँचे और सती अनुसूया ने सीता जी को ‘स्त्रीधर्म’ का गूढ़ ज्ञान दिया।
- शाश्वत ऋषि परंपरा: कैसे यह गाथा सप्तऋषि मंडल के माध्यम से आज भी हमारा पथ-प्रदर्शन कर रही है।
आपकी राय सादर आमंत्रित है
यह ग्रंथ एक डिजिटल प्रयोग है जिसे मैं निरंतर बेहतर बनाना चाहता हूँ। आप जब इसे पढ़ें, तो इसके छंदों, भावार्थ और संरचना पर अपनी बहुमूल्य अंतर्दृष्टि (Insights) अवश्य साझा करें।
- क्या कोई ऐसी पौराणिक कथा है जिसे और विस्तार मिलना चाहिए?
- क्या आजमगढ़ की कर्मभूमि के वर्णन में कुछ और विशिष्टताएँ जोड़ी जा सकती हैं? आपका एक सुझाव इस महाकाव्य को और अधिक प्रामाणिक और भव्य बना सकता है।
आइए, अपनी विरासत को डिजिटल माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँचाने के इस प्रयास का हिस्सा बनें।


